भारत एक प्राचीन और गौरवशाली सभ्यता का गवाह रहा है , जिसकी जड़ें अतीत में हजारों साल पुरानी हैं।
भारतके ऐतिहासिक संस्कृति और धार्मिक विश्वासों में द्वारका का विशेष स्थान है। भगवान श्रीकृष्ण की नगरी
के रूप में प्रसिद्ध द्वारका (dwarka )और समीप स्थित बेट द्वारका न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इन स्थलों का पुरातात्विक महत्व भी अत्यंत गहन है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने द्वारका और बेट द्वारका के जलमग्न पुरातात्विक अवशेषों की वैज्ञानिक जांच प्रारंभ की गई है, जो इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास
को और अधिक स्पष्ट रूप से जानने में सहायक सिद्ध होगी।
द्वारका ( dwarka ): इतिहास और धार्मिक महत्त्व
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद
अपनी राजधानी स्थापित की थी। यह शहर गुजरात राज्य के कच्छ की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है
और इसे चार धामों में से एक माना जाता है।
पौराणिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब श्रीकृष्ण मथुरा में बार-बार यदुवंशियों पर हो रहे हमलों से परेशान
हुए, तब उन्होंने समुद्र से भूमि प्राप्त कर द्वारका की स्थापना की। यह भूमि श्रीकृष्ण द्वारा समुद्र देवता
से याचना कर प्राप्त की गई थी। ऐसा माना जाता है कि द्वारका गुजरात की प्रथम राजधानी भी बनी।
पुरातात्विक खोजें और वैज्ञानिक अध्ययन
जलमग्न द्वारका (dwarka) की खोज- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने 1963 से द्वारका क्षेत्र में विभिन्न पुरातात्विक अध्ययन किए हैं। इन अध्ययनों में पत्थरों से बनी घाटें, एंकर (लंगर), किलेबंदी की दीवारें और समृद्ध बंदरगाह के अवशेष मिले हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि द्वारका प्राचीन काल में एक अत्यंत समृद्ध और विकसित बंदरगाह नगर था।
नवीन वैज्ञानिक अध्ययन – 2024-25
अब ASI ने इन पुरातात्विक अवशेषों की अधिक गहन और आधुनिक तकनीकों से जांच के लिए एक नया
वैज्ञानिक अध्ययन आरंभ किया है। इसमें समुद्र के अंदर सर्वेक्षण, 3D मैपिंग और कार्बन डेटिंग जैसे
आधुनिक उपाय शामिल किए जा रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि यह नगर वास्तव में महाभारत काल
का है या नहीं।
धार्मिक स्थल और सांस्कृतिक धरोहर
द्वारकाधीश मंदिर (जगद मंदिर)- द्वारका का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल है द्वारकाधीश मंदिर,
जिसे जगद मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है और इसका
पुनर्निर्माण 16वीं सदी में किया गया था, क्योंकि इसे महमूद बेगड़ा द्वारा नष्ट कर दिया गया था।
आज यह मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
शारदा पीठ
द्वारका ( dwarka )में ही स्थित है शारदा पीठ, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था। यह पीठ
चार मठों में से एक है और भारतीय वेदांत परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
बेट द्वारका: प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास
भौगोलिक स्थिति-बेट द्वारका या शंखोद्धार द्वीप, मुख्य द्वारका से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित
एक द्वीप है। यह स्थान ओखा बंदरगाह के माध्यम से जल मार्ग द्वारा सुलभ है।
महाभारत से संबंध
बेट द्वारका को अंतर्द्वीप (Antardvipa) के रूप में महाभारत में वर्णित किया गया है। ऐसा माना जाता
है कि यह द्वीप भगवान श्रीकृष्ण की निजी निवासस्थली थी, जहाँ वे अपने परिवार के साथ रहते थे।
धार्मिक स्थल
यहाँ गुरु वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित एक प्रसिद्ध मंदिर है, जो कृष्ण भक्ति के वल्लभ संप्रदाय से जुड़ा है।
यहाँ शंख, मुद्रा और अन्य पवित्र अवशेष पाए गए हैं जो इस क्षेत्र की धार्मिक गरिमा को दर्शाते हैं।
पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक प्रमाण
हड़प्पा और मौर्यकालीन प्रमाण-बेट द्वारका में हुए पुरातात्विक उत्खनों से यह प्रमाणित होता है
कि यह क्षेत्र हड़प्पा और मौर्य काल में भी आबाद था। यहाँ से मिट्टी के बर्तन, सीपों के आभूषण
और प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं जो इस क्षेत्र की प्राचीनता को सिद्ध करते हैं।
मध्यकालीन शासन और संघर्ष
मध्यकाल में यह क्षेत्र बड़ौदा के गायकवाड़ शासकों के अधीन था। 1857 की क्रांति के दौरान,
इस द्वीप पर वाघेर समुदाय ने संक्षिप्त समय के लिए अधिकार कर लिया था
आधुनिक विकास – सुदर्शन सेतु
भारत सरकार ने द्वारका और बेट द्वारका के बीच संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए सुदर्शन सेतु (Sudarshan Setu)
का निर्माण किया है, जो 2024 में उद्घाटित हुआ। यह भारत का सबसे लंबा केबल-स्टे ब्रिज है, जिससे अब भक्तों
और पर्यटकों को बेट द्वारका तक पहुँचने में भारी सुविधा होती है। यह सेतु श्रद्धालुओं के लिए आस्था की डोरी है
और साथ ही यह क्षेत्र के पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी गति प्रदान करता है।
निष्कर्ष
द्वारका और बेट द्वारका केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण
स्थल हैं। ASI द्वारा किए जा रहे नवीन वैज्ञानिक अध्ययन इस बात की पुष्टि करने की दिशा में बड़ा कदम हैं कि
क्या महाभारत कालीन द्वारका वास्तव में समुद्र में जलमग्न हुई नगरी है या नहीं।
इन खोजों से भारत के इतिहास और पौराणिक कथाओं को प्रमाणिकता मिलने की संभावना है। साथ ही यह भी
सिद्ध होगा कि द्वारका केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सच्चाई है, जो विज्ञान और आध्यात्म
दोनों की दृष्टि से समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

One thought on ““Dwarka-Lost City of Krishna? Stunning New Findings in 2025!”